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दूसरों पर मत हंसो: गज्जू हाथी और छोटू चूहे की अनोखी सीख

पढ़िए 'दूसरों पर मत हंसो' पर आधारित एक दिलचस्प जंगल की कहानी। गज्जू हाथी और छोटू चूहे की यह कहानी बच्चों को सहानुभूति और सम्मान की सीख देती है।

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क्यों ज़रूरी है दूसरों का सम्मान करना?

बच्चों, अक्सर हम किसी की कमजोरी या उनके अलग दिखने पर हंस देते हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि उस वक्त उस व्यक्ति को कैसा लगता होगा? जंगल की दुनिया से जुड़ी यह कहानी "दूसरों पर मत हंसो" के महत्व को बड़े ही सुंदर ढंग से समझाती है। इसमें तर्क (logic) है, भावनाएं हैं और एक ऐसी सीख है जो आपकी ज़िंदगी बदल देगी। चलिए चलते हैं 'नीलगिरी वन' की सैर पर।

नीलगिरी वन का सबसे ऊँचा अभिमान: गज्जू हाथी

एक बहुत ही सुहाना जंगल था जिसका नाम था नीलगिरी वन। वहाँ हर तरह के जानवर रहते थे—शेर, चीता, हिरण और बंदर। लेकिन उस जंगल का सबसे बड़ा और ताकतवर जानवर था गज्जू हाथी। गज्जू का शरीर किसी पहाड़ जैसा था, उसके कान बड़े पंखों जैसे थे और उसकी सूँड इतनी मज़बूत थी कि वह एक झटके में पेड़ उखाड़ सकता था।

लेकिन गज्जू में एक बहुत बुरी आदत थी। वह अपनी ताकत के घमंड में छोटे जानवरों का मज़ाक उड़ाया करता था। जब भी वह किसी हिरण को तेज़ भागते देखता, तो कहता, "ऐ पतली टांगों वाले, इतना क्यों भाग रहा है? मेरी एक लात पड़ी तो ज़मीन में धंस जाएगा!" और फिर वह ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता।

छोटू चूहा: एक छोटा सा जीव, बड़ी सोच

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उसी जंगल में एक नन्हा सा चूहा रहता था जिसका नाम था छोटू। छोटू दिखने में बहुत छोटा था, लेकिन उसकी अकल बहुत तेज़ थी। वह अपने परिवार के साथ एक पुराने बरगद के पेड़ की जड़ों के नीचे रहता था।

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एक दिन गज्जू हाथी वहाँ से गुज़र रहा था। उसने देखा कि छोटू बड़े ध्यान से एक अखरोट के छिलके को कुरेद रहा था। गज्जू ने अपनी सूँड से ज़ोर से फूँक मारी, जिससे छोटू उलट-पुलट गया और उसका अखरोट दूर जा गिरा।

गज्जू ठहाका मारकर हंसने लगा, "हाहाहा! देखो इस बौने को! ज़रा सी हवा क्या लगी, गेंद की तरह लुढ़क गया। छोटू, तुम्हारे होने न होने से इस जंगल को क्या फर्क पड़ता है? तुम तो बस पैरों के नीचे आने के लिए बने हो।"

छोटू ने अपने कपड़े झाड़े और थोड़ा दुखी होकर बोला, "गज्जू भाई, भगवान ने सबको किसी न किसी मकसद से बनाया है। किसी पर हंसना अच्छी बात नहीं है। वक्त आने पर हर चीज़ की अपनी कीमत होती है।"

गज्जू ने फिर मज़ाक उड़ाया, "वक्त? तुम जैसा छोटा जीव मेरे काम आएगा? चलो भागो यहाँ से, वरना दबाकर कचूमर निकाल दूँगा।"

जंगल में मुसीबत का साया

दिन गुज़रते गए। नीलगिरी वन में खुशी का माहौल था, लेकिन एक शाम कुछ अजीब हुआ। जंगल के किनारे पर कुछ शिकारियों ने डेरा डाला था। वे लोग बड़े जानवरों, खास करके हाथियों को पकड़ने आए थे।

शिकारियों ने एक बहुत बड़ा और मज़बूत लोहे का जाल और रस्सी का फंदा बिछाया था। उन्होंने उस पर हरे पत्ते और केले रख दिए ताकि कोई हाथी लालच में आ जाए। गज्जू, जो हमेशा बेखौफ घूमता था, उसी रास्ते से गुज़र रहा था। उसने मीठे केलों की खुशबू सूँघी और बिना सोचे समझे वहाँ चला गया।

जैसे ही गज्जू ने पहला कदम रखा, एक ज़ोरदार 'खड़क' की आवाज़ हुई। गज्जू एक गहरे गड्ढे में गिर गया जिसके ऊपर रस्सी का मज़बूत जाल बिछा था। गज्जू ने निकलने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह जाल इतना सख्त था कि उसकी ताकत काम नहीं आ रही थी।

जब ताकत हार गई और उम्मीद जागी

गज्जू ज़ोर-ज़ोर से चिंघाड़ने लगा, "बचाओ! कोई है? मुझे यहाँ से निकालो!"

उसकी आवाज़ सुनकर कई जानवर वहाँ आए—बंदर आए, हिरण आए, यहाँ तक कि लोमड़ी भी आई। लेकिन जाल लोहे की तारों और मोटी रस्सियों से बना था। किसी के पास उसे काटने का कोई ज़रिया नहीं था। सबने कहा, "गज्जू भाई, हम माफ़ी चाहते हैं, पर हम इस जाल को नहीं तोड़ सकते। शिकारियों के आने का वक्त हो रहा है, हमें अपनी जान बचानी होगी।"

गज्जू की आँखों में आँसू आ गए। उसने सोचा, "आज मेरा अंत निश्चित है। मैं इतना बड़ा हाथी होकर भी इस जाल के सामने बेबस हूँ।"

तभी एक छोटी सी आवाज़ आई, "गज्जू भाई, घबराओ मत, मैं आ गया हूँ!"

गज्जू ने नीचे देखा, वहाँ छोटू चूहा अपने 20-25 दोस्तों के साथ खड़ा था। गज्जू को अपनी पुरानी बातें याद आईं और वह शर्मिंदा हो गया। उसने रोते हुए कहा, "छोटू, मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हारा मज़ाक उड़ाया था। लेकिन आज तुम यहाँ से जाओ, शिकारियों की बंदूकें तुम्हें मार देंगी।"

छोटू का कमाल: तर्क और मेहनत

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छोटू ने मुस्कुरा कर कहा, "दोस्त, बड़े काम हमेशा बड़ी ताकत से नहीं, बल्कि सही हुनर से होते हैं।"

छोटू और उसकी पूरी पलटन जाल पर चढ़ गई। चूहों के दाँत बहुत तेज़ होते हैं, खास कर जब वे मिलकर काम करें। छोटू ने ऑर्डर दिया, "सब लोग एक-एक रस्सी पकड़ो और इसे कतरना शुरू करो!"

किश-किश, किश-किश... पूरे 15 मिनट तक चूहों ने अपनी पूरी जान लगा दी। धीरे-धीरे जाल की मोटी रस्सियाँ टूटने लगीं। शिकारियों की जीप की आवाज़ दूर से सुनाई देने लगी थी। गज्जू का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

आखरी रस्सी बची थी। छोटू ने अपनी पूरी ताकत से उसे काटा और—'तड़क!'—जाल खुल गया।

गज्जू ने तुरंत गड्ढे से बाहर छलांग लगाई। उसने छोटू और उसके दोस्तों को अपनी सूँड पर बैठाया और घने जंगल की तरफ भाग निकला। शिकारियों ने जब खाली गड्ढा देखा, तो वे दंग रह गए। उन्हें समझ ही नहीं आया कि इतना बड़ा हाथी जाल तोड़कर कैसे निकल गया।

एक नयी शुरुआत: घमंड का अंत

उस दिन के बाद नीलगिरी वन बदल गया। गज्जू अब घमंडी हाथी नहीं था। उसने पूरे जंगल के सामने छोटू से माफ़ी माँगी। अब गज्जू किसी छोटे जानवर पर नहीं हंसता था। बल्कि, वह उनकी मदद करता था। अगर कोई छोटा जानवर नदी पार नहीं कर पाता, तो गज्जू उसे अपनी पीठ पर बैठा कर पार करवाता।

गज्जू ने सीखा कि हर जीव का अपना एक महत्व होता है। Empathy (सहानुभूति) हमें सिखाती है कि दूसरों के दुख को समझना कितना ज़रूरी है।

सीख (Moral of the Story)

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि "दूसरों पर मत हंसो, क्योंकि हर किसी के पास कोई न कोई ऐसी खूबी होती है जो आपके पास नहीं है।" किसी का मज़ाक उड़ाने से आप बड़े नहीं बनते, बल्कि दूसरों की इज़्ज़त करने से आपका सम्मान बढ़ता है। 

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